Sunday, 18 December 2016

BlogMas 2016 Day Sixteen - 200/2016

Hello. It's Day Sixteen.
It is also my two hundredth post on this blog. My grandfather always preferred to write his poems in Hindi or Urdu. This is for him, and my father.

"...live in the question."
                                                     - Rainer Maria Rilke

वो चीज़ ढूंढता रहा ज़िन्दगी भर 
जिसे पाने के लिए कुछ खर्च न करना पढ़े 
भूल गया था रोज़ की दस्तूरी में 
जिसे खर्च करना था वही पल गवा रहा था। 

वो पल ढूंढता रहा ज़िन्दगी भर 
जिन में सिर्फ अख़बार के पन्नो का 
जहाज़ बनाना भी सपना लगता था 
जवानी तक आते आते भूल गया
जिस पल की तलाश थी, वो ग़ुम था 
मगर मेरा बचपन तो अब भी मेरे साथ ही था। 

वो पल के इंतज़ार में गुज़ार दिया पूरा पहर 
उसी खिड़की के सामने, देखता था जहाँ से 
गाड़ियों को सारे मौसम पार करते हुए 
किरणों से बूंदों का सफ़र नप भी गया 
और कीचड़ में एक गेंद उछालने का मौका भी न चुरा पाया।

उस रोज़ उन्ही बीते पलों की उम्मीद में 
दरवाज़े पर आए दस्तक का जवाब दिया 
सोचा ज़िन्दगी ने कुछ पल उधार देने का फैसला कर लिया 
पर ज़िन्दगी की घात में समय आया था 
वापस लेने के लिए वही पल 
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी भर भीक मांगता रहा जिनकी
फ़र्क सिर्फ़ इतना था, मैं अपने बीते हुए बेच कर 
कुछ नए पलों का सौदा करना चाहता था 
और समय मुझसे कुछ खूबसूरती लेकर,
मुझे बदले में कुछ खोकला बेचना चाहता था। 

भिखरी सी यादों में पुराने दोस्त ढूंढ रहा था  मैं
समय ने तो ख़ुद से मिलने का भी वक़्त न दिया
उस दो बटा सोलह की छोटी सी चॉल में भी 
अपनी कमाई हुई यादों के इर्ध-गिर्ध भी 
आईने में रोज़ एक अजनबी से मिलता रहा। 

Until then.



Have Yourself a Merry Little Christmas.
Ak.

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